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गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

परमात्मा का अस्तित्व

ॐ 


सभी भाई बहन जानते हैं कि परमात्मा होता है परन्तु भौतिक विज्ञान से युक्त बुद्धि वाले हमारे भाई बहन यह नहीं मानते और कहते हैं कि परमात्मा होता ही नहीं और वे आत्मा के अस्तित्व को भी नकारते हैं और न ही उनका लोक, परलोक, कर्म, भाग्य, पूर्व व पर जन्म में ही विश्वास होता है।  वे मानते हैं कि यह संसार आदि काल से ऐसे ही चला आ रहा है और इसका कोई नियामक या शासक नहीं होता।  समय समय पर नयी नयी व्यवस्थाएं बनती हैं और कभी लोकतंत्र तो कभी राज तंत्र तो कभी आततायियों का प्रभुत्व तो कभी अच्छे लोगों का शासन बिना किसी प्रभु की इच्छा के आता रहा है। मेरी यह पोस्ट उन ही भाई बहनों के लिए समर्पित है। 

भाइयों बहनों! आप अपने सामने देखो यह कप्यूटर या मोबाइल का स्क्रीन भी किसी ने बनाया है खुद ब खुद नहीं बन गया।  जिस में आप चाय पीते हो वह कप भी किसी ने बनाया है।  चाय जो पीते हो वह भी कोई स्त्री या पुरुष या आप खुद बनाते हो खुद ही नहीं बनती।  जिन किताबों को आप पढ़ते हो वह भी किसी ने बनायी हैं और कंप्यूटर से छापते हुए भी कोई मानव ही था जिस के कारण छपीं।  जिस पैन को आप प्रयोग करते हो वह भी किसी मानव ने ही बनाया।  इसी प्रकार जिस पलंग पर आप सोते हो वह भी किसी बढ़ई ने बनाया। जिस कॉपी पर आप लिखते हो वह भी मानवों के द्वारा निर्मित हैं।  किसी या किन्हीं मानव/मानवों ही ने इनकी खोज की और फिर मानवों के द्वारा ही मशीन्स की सहायता से व बुद्धि और ज्ञान के प्रयोग साथ साथ पदार्थों के संयोग के द्वारा ही ये सभी चीज़ें बनायी गई हैं खुद ही नहीं बनी हैं।  है न? अर्थात कोई भी पदार्थ या वस्तु खुद ही नहीं बन सकती उसका कोई न कोई बनाने वाला होता है।  

अब विचारो कि इतने बड़े सूर्य को किसने बनाया होगा। हम यदि विचारें कि पूर्व समय में बहुत बड़े बड़े मानव रहे होंगे उन ही ने बनाया होगा तो इतना बड़ा मानव तो हो नहीं सकता जो पृथ्वी से लाखों गुना बड़े सूर्य का निर्माण कर सके।  और पुराने समय में अधिक से अधिक आज से दुगने मानव होते होंगे उससे बड़े तो संभव ही नहीं।  अर्थात सूर्य को किसी और ने बनाया है क्यूंकि यह पदार्थ बिना बनाये तो बन नहीं सकता।  तो भाई जिसने भी बनाया वह ही परमात्मा है। देखो मानव के नेत्र को विचारो कोई वैज्ञानिक ऐसा नहीं हुआ जो ऐसे नेत्र बना सके, केवल ट्रान्सप्लांट ही किया करते हैं डॉक्टर मानव नेत्र के ऑपरेशन्स के समय।  इसी प्रकार हृदय आदि को भी विचारें।  ये अंग मानव नहीं बना सकता।  अर्थात माता के गर्भ में जिसने भी बनाया वह ही परमात्मा है भाइयों! 

अब विचारें फूल, कितनी सुन्दर नक्काशी, और सभी पंखुड़ियों की व्यवस्था और डिज़ाइन एक जैसे, तो भाई फूल को भी निश्चित रूप से परमात्मा ही बनाता है।  और यह पृथ्वी भी एक समान गति से अरबों वर्षों से घूम रही है तो उस को प्रारंभिक गति देने वाला कौन जो गति पाकर पृथ्वी अभी तक नहीं रुकी? तो भाई पृथ्वी के निर्माण के पश्चात उस गति को देने वाला भी परमात्मा ही है?

अतः सिद्ध हुआ कि परमात्मा है। 


परमात्मा वायु के सामान अदृश्य चेतना के रूप में सारे ब्रह्माण्ड में फैला है और पार निकला हुआ है। उपनिषदों के अनुसार परमात्मा इतना सूक्ष्म भी है कि मानव के ह्रदय की गुफा में समा जाता है।  हमारे सिर के बाल की अनुप्रस्थ काट के ९९ भाग करें उस एक भाग के ६० भाग करें फिर उससे प्राप्त  एक भाग के ९९ भाग फिर करें और प्राप्त एक भाग के फिर ६० भाग करें - भाइयों बहनो इतना सूक्ष्म परमात्मा है।  और इतना विस्तृत है कि हम असंख्य जीव उस पिता परमात्मा के भीतर समाये हुए हैं अर्थात उस माता के गर्भ में समाये हुए हैं। वह परमात्मा हमारी माता भी है और पिता भी।  परमात्मा क्यूंकि एक चेतना है और हर समय हर स्थान पर पहले से ही मौजूद है अतः उसकी मूर्ति नहीं बन सकती।  परन्तु वह नहीं है ऐसा कभी नहीं विचारना चाहिए।  क्यूंकि वह हर वक़्त हमें देखता है और हमारे मन की बातें भी सुनता है। 

आपका अपना 
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

शुक्रवार, 28 मार्च 2014

एक मन्त्र

ॐ वायुरनिल  ममृत मथेदम्   भस्मान्तं शरीरं ।
ओम् कृतो स्मर क्लिबे स्मर कृतं स्मर||यजुर्वेद। ४०।

परमात्मा द्वारा रचित ये शरीर अन्त काल मे भस्म होकर पञ्च तत्वों में  विलीन हो जाने के लिए ही मिला है  ए प्राणी इसलिए तूने जो कर्म कर लिए हैं उन को याद कर। जो कर्म तू अब कर रहा है उन का भी स्मरण कर और भविष्य में तेरे द्वारा किये जाने वाले कर्मों का भी अभी से ही स्मरण कर।

परम पिता परमात्मा द्वारा वेद के रूप में दिए गए इस उपदेश का साफ़ अर्थ ये है कि हमें अपने को इस प्रकार का बना लेना चाहिए कि हमको पुरानी बातें भी याद रहें और अपने वर्त्तमान कर्म को करते हुए हमें बहुत ही सावधानी से कार्य करना चाहिए और उसे याद भी रखना चाहिए के हम क्या कर रहे हैं और उसका क्या प्रभाव पड़ने वाला है।  तथा भविष्य का ज्ञान भी कर्म करने के लिए आवश्यक है।  हालांकि भविष्य का ज्ञान योग के द्वारा ही सम्भव होता है लेकिन साधारण सामाजिक पद्यतियों से भी ये ज्ञान हो जाता है और प्लान बना कर काम करने से भी भविष्य का ज्ञान पहले ही हो जाता है। 

आपका 
भवानंद आर्य 'अनुभव'

शनिवार, 15 मार्च 2014

जीवन निरर्थक जाने न पाये

हे नाथ अब तो ऐसी कृपा हो जीवन निरर्थक जाने न पाये।
यह मन न जाने क्या क्या दिखाए कुछ बन न पाया मेरे बनाये।

संसार में ही आसक्त रहकर दिन रात अपने मतलब की कह कर।
सुख के लिए लाखों दुःख सहकर ये दिन अभी तक यूँ ही बिताये।

ऐसा जगा दो फिर सो न जाऊं अपने को निष्काम प्रेमी बनाऊं।
मैं आप को चाहूँ और पाऊँ संसार का कुछ भय रह न जाये।

वह योग्यता दो सत्कर्म कर लूं अपने हृदय मैं सदभाव भर लूँ ।
नरतन है साधन भव सिन्धु तर लूँ ऐसा समय फिर आये न आये।

हे दाता हमें निरभिमानी बना दो दारिद्र हर लो दानी बना दो। 
आनंद मय विज्ञानी बना दो मैं हूँ पथिक यह आशा लगाये।




(पूज्यपाद स्वामी रामदेव जी के गाये भजनों से साभार )

आपका
भवानंद आर्य

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

सत्य

परमात्मा कहते हैं कि "मैं सत्यवादी को सत्य सनातन ज्ञानादि धन देता हूँ।  मैं यज्ञ करने वाले को फल प्रदाता और इस संसार में जो कुछ भी है उसका बनाने व धारण करने वाला हूँ अतः मेरे सिवाय मेरे स्थान पर और किसी को मत पूजो, मत मानो, मत जानो।"


आपका 
भवानंद आर्य 'अनुभव '

बुधवार, 12 मार्च 2014

प्रभु तन में रमा करना

प्रभु तन में रमा करना  प्रभु मन में रमा करना।
वैकुण्ठ यहीं तो है इस में ही बसा करना।

हम मोर बनके प्रभु जी नाचा  करेंगे वन में। 
तुम श्याम घटा बन के उस वन में उठा करना।

होकर के हम पपीहा पी पी रटा करेंगे।
तुम स्वाति बूंद बनके प्यासे पे दया करना।

हम दीन दुखी जग में तुम को ही निहारेंगे।
तुम दिव्य ज्योति बन कर नयनों में रहा करना।


(पूज्यपाद स्वामी रामदेव जी के गाये भजनों से साभार  )


 आपका
भवानंद आर्य

मन में ॐ बसा ले

बोलो ॐ जय जय ॐ जय जय ॐ।

जनम सफल होगा रे बन्दे।
मन में ॐ बसा ले मन में ॐ बसा ले।

बोलो ॐ आजा ॐ आजा ॐ।

ॐ नाम के मोती को सांसों की माला बना ले।
मन में ॐ बसा ले।

ॐ पतित पावन करुणाकर और सदा सुख दाता।
सरस सुभावन अति मन भावन  ॐ  से प्रीत लगा ले।
मन में ॐ बसा ले। 

भोले ॐ आजा ॐ  आजा ॐ ।

मोह माया है झूंठा बंधन त्याग उसे ए प्राणी।
ॐ  नाम की ज्योत जलाकर अपना भाग्य जगा ले।
मन में ॐ बसा ले। 

ॐ  भजन में डूब के अपनी निर्मल कर ले काया।
ॐ  नाम से प्रीत लगा के जीवन पार  लगा ले ।
मन में ॐ बसा ले। 


आपका
भवानंद आर्य


मंगलवार, 11 मार्च 2014

उन्नत जीवन जो करना है

उन्नत जीवन जो करना है मन ॐ जपो मन ॐ जपो
भव सागर पार उतरना है मन ॐ जपो मन ॐ जपो

संकट के बादल घिर आयें छा जाये निराशा जो मन में
भयभीत हृदय जब हो जाये मन ॐ जपो मन ॐ जपो

विषयों के जब तूफ़ान उठे मन में चंचलता आ जाये
जब बुद्धि नैय्या  डोल उठे मन ॐ जपो मन ॐ जपो

चिंता की अग्नि धधक उठे मन में व्याकुलता छा जाये
सच्ची निष्ठां आधार बना मन ॐ जपो मन ॐ जपो

पथ दुर्गम हो कितना चाहे और जाना भी हो दूर हमें
अपार हृदय विश्वास लिए मन ॐ जपो मन ॐ जपो

 उन्नत जीवन जो करना है मन ॐ जपो मन ॐ जपो


(पूज्य स्वामी रामदेव जी द्वारा गाये भजन से)

इस भजन को उर्दू में पढ़ें

आपका अपना
भवानंद आर्य

सोमवार, 10 मार्च 2014

ॐ नाम का दीप जला लेना

जब चारों ओर अँधेरा हो।
ॐ नाम का दीप जला लेना।
चाहे साँझ हो चाहे सवेरा हो।
प्रभु नाम का दीप जला लेना।

छोड़ दे भी ज़माना तो परवा ना कर।
वो तेरे साथ है तो जहाँ साथ है।
बस ग़ुज़र जाएगा तेरा हर मरहला।
तेरी हर दौड़ में प्रभु का हाथ है।
जितना भी ग़मों ने घेरा हो।
प्रभु नाम का दीप जला लेना।

तुझको जीना है ये सब्र के घूँट पे।
शुक्र कर तू कि ये ज़िन्दगी मिल गयी।
शुक्र कर तू कि तुझको हज़ारों मिले।
चाहे जीवन में कितनी भी शोहरत मिले।
जिस हाल में तेरा बसेरा हो।
प्रभु नाम का दीप जला लेना।

इस पोस्ट को उर्दू  में पढ़ें

(पूज्य स्वामी रामदेव जी के द्वारा गाया गया एक भजन )

आपका अपना
भवानंद आर्य

ओ दाता हम पे दया रखना

ओ दाता हम पे दया रखना।
ओ दाता हम पे दया रखना।

तुम ना  होते जग ना होता।
बिखरे मोती कौन पिरोता?
जीव बेचारा तुम बिन ऐसे।
बालक बिन माता।
ओ दाता हम पे दया रखना।

सूरज में ये चमक ना होती।
चाँद में शीतल दमक ना होती।
मेघ ना गिरता जल ना बरसता।
बीज ना उग पाता।
ओ दाता हम पे दया रखना।

तुम हो एक खुदा करें हम विनती।
सुन लो छोटी सी एक विनती।
बिना तुम्हारे किसीके आगे.
झुके नहीं माथा।
ओ दाता हम पे दया रखना।

(स्वामी रामदेव जी द्वारा गाया गया एक भजन )

आपका अपना 
भवानंद आर्य

शुक्रवार, 7 मार्च 2014

प्रभु तेरी शरण में

कोशिश की पाने की बहुत इस दुनिया को।
कुछ ना मिला पर कुछ ना मिला।
चाहा बहुत इस दुनिया को इस दुनिया को।
प्यार किया जिनसे और माना अपना।
वे हो गए बेगाने से बेगाने से।

बसाया जिनको दिल में।
तोड़ दिया उन्होंने दिल तोड़ दिया।
छोड़ दिया बीच भंवर में छोड़ दिया।
सबका तो नहीं पर बहुतों का है दर्द यहीं।

लेकिन प्रभु तू ही मेरा ऐसा है।
 जो कभी दुःख में भी साथ नहीं छोड़े।
जब जग में क़दम डोलें मेरे।
है तू ही प्रभो बचाता।

विकट संकट में भी तू ही है पार लगाता।

जब कभी राह नज़र न आये।
चारों ओर अँधेरा छा जाये।
तू ही है आसरा प्रभु उस समय तू ही है।
प्रभु तेरी शरण में हूँ।

प्रेरणा : स्वामी रामदेव जी के भजन से

आपका
भवानंद आर्य

बुधवार, 5 मार्च 2014

एक तेरी दया का दान मिले: भजन

 ॐ 
एक तेरी दया का दान मिले,
एक तेरा सहारा मिल जाये ।
भव सागर में बहती मेरी,
नैय्या को किनारा मिल जाये ।

जीवन  की टेढ़ी राहों पर,
चलकर न तुझको जान सका ।
आशाओं की झोली भर जाये,
एक तेरा द्वारा मिल जाये ।
एक तेरी दया का दान मिले।

मैं नर हूँ तुम नारायण हो,
इतना तो भेद ज़रूरी है ।
यदि शरण तेरी मैं पा ना सका,
नर तन तो दुबारा मिल जाये ।
एक तेरी दया का दान मिले।

शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

परमात्मा को पत्र

प्यारे व आदरणीय परमपिता परमात्मा,

देखो भगवान जी आपका सही सही ज्ञान हमें नहीं है लेकिन जितना मैंने आपके बारे में विद्वानों की पुस्तकों से जाना है आप का  मुख्य नाम ॐ है ।
नमस्ते प्रभु ,

आज मैं संकट में हूँ मुझे तीन वरदान और एक आशीर्वाद चाहिए कि
वरदान
१. मेरी आजीविका कम से कम २००००  मासिक बंध जाये जिससे कि मैं श्रुति को भी खुद ही पढ़ा पाऊँ ।
२. मुझे उन नीच मेरी पत्नी राधा , सालो और उस सूअर ससुर के झूंठे मुकदमों से मुक्ति मिल जाये । (Ati sheeghr Pura Karo Is Kamna Ko)
*३. मेरी भी कोई अपनी प्रेमिका हो जो पूरे जीवन भर मेरा साथ निभाए लेकिन मेरे ही जैसी हो । (Ye Kamna Puri Nhin Honi Chahie)
आशीर्वाद
प्रभु आशीर्वाद दो कि  मैं अध्यात्मिक  व भौतिक दोनों उपलब्धियाँ भरसक कर पाऊँ और योग में व ज्ञान में ऐसी उन्नति करूँ कि अपने विष्णु रूप को जानने में सक्षम हो पाऊँ ।

और प्रभु आशीर्वाद के साथ साथ हमें श्राप भी ज़रूर देना क्योंकि मैं इतना अच्छा नहीं हूँ जितना दुनिया मेरे बारे में सोचती है । पर आपको तो सब पता है । अच्छाई के साथ साथ इतनी कमियां हैं मुझमें कि जी करता है कि अपनी सारी पोल दुनिया के सामने खोल दूँ । बस भगवान जी इतने लिखे को ही बहुत समझना ।

धन्यवाद प्रभु जी
प्रभु जी इतनी सी दया करना हम को भी तुम्हारा प्यार मिले ।

इस पोस्ट को इंग्लिश में  पढ़ें

आपका अपना
अनुभव शर्मा या भवानंद

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

मृत्यु की मृत्यु


जब हम यज्ञ करते हैं तो सामग्री अग्नि निगल लेती है, अग्नि को  जल निगल लेता है, जल वायु द्वारा , वायु अंतरिक्ष द्वारा निगली जाती है। और तब यह ब्रह्म में स्थित हो जाता है । परमात्मा हमारे यज्ञ व श्रद्धा  को स्वीकार करते हैं जब हम यज्ञ करते हैं । हमें परमात्मा के प्रति व उसकी रचना के प्रति बहुत ही गहरी श्रद्धा होनी चाहिए क्योंकि परमात्मा हमारी अन्तर्निहित भावनाओं का भोजन करते हैं । 
संसार में हम इस बारे में चिंतित रहते हैं कि मृत्यु की मृत्यु क्या है? पूर्व में एक ऋषि द्वारा यह कहा गया है कि ब्रह्म मृत्यु की मृत्यु है । कोई ब्रह्मवेत्ता जो यह जानता है कि ब्रह्म मृत्यु की मृत्यु है वह कभी मृत्यु से नहीं डरता । उसके लिए मृत्यु कुछ नहीं होती । वास्तव में अज्ञान में ही मृत्यु होती है । ज्ञान में सदैव जीवन होता है । 

(विचार पूज्यपाद ब्र 0 कृष्ण दत्त जी के प्रवचनो से लिए गए हैं )
आपका 
भवानंद आर्य

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

ओ सुप्रीम पावर गोड!


परमात्मा सदा अदृश्य है,
वह है लेकिन अदृष्ट है ।
कोई भी सूक्ष्मदर्शी आत्मा  को ही नहीं देख सकता ,
तो फिर परमात्मा को देखना कैसे सम्भव है?

वह है वायुवत, आकाशवत।
जिसे अनुभव तो हैं कर सकते पर देख नहीं सकते।
जानते उसे हैं  समाधिस्थ बुद्धि से।  
यही तथ्य है मेरा मत ।

उसकी प्रतिमा बन नहीं सकती ।
न वह मानव रूप में कभी जन्म लेता।
वह अपने समस्त काम पूरे खुद है कर सकता,
जैसे रावण या कंस को मारना,
बिना जन्म लिए या मृत्यु को पाए
क्योंकि वह है सर्वशक्तिमान।


आदरणीय मैं आपको हूँ प्रेम करता।
आप माँ  दुर्गा हो, आप माँ काली हो,
आप पिता राम हो, आप पिता कृष्ण हो,
आप पिता शिव हो, आप पिता ब्रह्मा हो।

भगवान कृष्ण , भगवान राम, भगवान् ब्रह्मा, भगवान् शिव,
और मेरे गुरु थे बहुत ही ऊँचे लेकिन,
तुम राम हो क्योंकि हो सर्वव्यापी।
तुम कृष्ण हो क्योंकि  हो महायोगी । 
तुम ब्रह्मा हो क्योंकि तुमने है ब्रह्माण्ड बनाया ।
आपका मुख्य निज नाम ॐ है क्योंकि आप हमारे लिए हो करते सब कुछ।

ओ प्यारे पिता मैं आपको हूँ प्रेम करता ।
मैं हूँ लेना चाहता आपके कुछ गुण ।
और मैं प्राप्त कर लूँगा निश्चित
यदि चाहो आप,
वरन  कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता
यदि चाहो नहीं आप ।
मेरा है नहीं कोई
क्योंकि आप चाहते हो ऐसा ही ।

परन्तु पृथ्वी मेरी है।
अग्नि मेरी है।
वायु  मेरी है।
आकाश मेरा है।
जल मेरा है।
जो मैं माँगूँगा आपसे मिलेगा मुझे , मैं जानता  हूँ।

ओ प्यारे पिता!
ओ महानतम कवि! जिसने सबसे बड़ी कविता वेद है बनाया,
मैं भी एक छोटा कवि बनना हूँ चाहता।
मैं जानता हूँ कि आप सब कुछ हैं समझते जो मैं चाहता हूँ!
इसलिए कृपया मुझे वो सब दो,
जो मेरी हैं आवश्यकताएँ।
परन्तु मुझे ऐसा बना देना प्रभु!
कि मुझे अवसर मिले ही नहीं,
कोई बुरा कर्म करने का !

मूल कविता पढ़ें , अंग्रेजी में
आपका
भवानंद आर्य "अनुभव"

बुधवार, 5 जनवरी 2011

भगवान के दर्शन कैसे हों?

योग के द्वारा हम भगवान के दर्शन कर सकते हैं. पहले मुझे शरीर के आठ चक्रों के बारे में कुछ बताना है. पहला मूलाधार नाम का चक्र हमारे शरीर में जननेंद्रिय के समीप होता है. दूसरा नाभि चक्र, नाभि के समीप होता है. तीसरा हृदय चक्र हमारे हृदय के समीप होता है. चौथा चक्र हमारे गले में कंठ चक्र नाम से होता है. पांचवां  चक्र हमारे नाक के स्थान पर नासिका चक्र नाम से होता है. छटा चक्र हमारे मस्तक में आज्ञा चक्र नाम से होता है. सातवां चक्र ब्रह्म रंध्र के नीचे होता है. जो ब्रह्म रंध्र हमारे शरीर में सबसे ऊपर खोपड़ी में स्थित होता है. आठवां चक्र हमारी रीढ़ में स्थित होता है जिसे पुष्प चक्र कहते हैं. हमारे शरीर में नौ रंध्र है जिन्हें हर कोई गिन सकता है.
हमारे शरीर में दस इन्द्रियां होती हैं जो कार्य करती हैं. पांच ज्ञानेन्द्रियाँ और पांच कर्मेन्द्रियाँ. मैं आपको बता रहा हूँ कि वे क्या हैं? पांच ज्ञानेन्द्रियाँ - १. त्वचा जिससे स्पर्श होता है. २. ऑंखें जिससे देखा जाता है. ३. नाक जिससे सूंघते हैं. ४. कान जो सुनते हैं. ५. जीभ जो स्वाद लेती है. अब अगली पांच कर्मेन्द्रियाँ ये हैं - १. हाथ २. पैर ३. मुंह जो खाता  है. ४. उपस्थ ५. गुदा. अब अगर हम योगी बनना चाहते हैं तो हमें अपनी ज्ञान और कर्म इन्द्रियों को संयमित करना होता है. अब मैं आपको अष्टांग योग के बारे में  बताऊंगा - इसमें हमें आठ प्रकार के कार्य पूरे करने होते हैं. पहला यम, फिर नियम, आसान, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधी. यम के बाद नियम आता है. जिसमें ये हिस्से हैं - शौच (सफाई और शुद्धि), संतोष(संतुष्ट रहना), तप (कठिन कार्यों को करना), ईश्वर प्रणिधान (भगवान का चिंतन), स्वाध्याय(अध्ययन). जब हम इन यम और नियमों को पार करते हुए आगे बढ़ते हैं तब हमें व्यायाम, आसान, प्राणायाम, धारणा (लक्ष्य को बंधना), ध्यान (एक लक्ष्य पर मन को बांध लेना) और समाधी(भगवान के साथ एक रस हो जाना) में क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए. इस समाधी में हम ऐसी बहुत सी चीज़ें सीख सकते हैं जो कि सामान्य अवस्था में नहीं पता चल सकतीं. 
अब हम अपने प्राण व मन को एकाग्र करने योग्य हो जाते हैं. जिसके द्वारा एक यान बनता है. अब धीरे धीरे इस यान को (जिसमें आत्मा विराजमान है) मूलाधार से ऊपर के चक्रों में ले जाया जाता है. अंत में जब यह यान पुष्प चक्र में पहुँचता है तो हम परम पिता के दर्शन कर लेते हैं.

धन्यवाद
अनुभव शर्मा
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