रविवार, 23 मार्च 2014

दिव्य राम कथा : हनुमान जी

दीप मालिका

आज हम नाना प्रकार की विद्याओं में परिणत होना चाहते हैं क्योंकि वेद के एक एक वेद मंत्र को ले कर के मानव जब गान गाता है तो मानव कृतार्थ हो जाता है, धन्य हो जाता है।  हनुमान दीप मालिका राग को जानते थे, मुझे (श्रृंगी ऋषि ) वह काल स्मरण है | दीपमालिका तो परंपरा से ऋषि मुनियों के मस्तिष्कों में रही है।  जब लंका को विजय करके अयोध्या में राम आ पहुंचे थे तो उस समय हनुमान जी ने राम के समीप ये गान गाया  था।  जब दीपक गान गाने लगे तो अयोध्या में  दीपक ही दीपक प्रकाशित हो गए , तो महाराजा भरत को ये प्रतीत हो गया कि राम अयोध्या में , लंका को विजय कर के आ गए हैं।  क्योंकि हनुमान जी का ये गान है और गान के द्वारा ये दीपमालिका का प्रकाश होता है।  इस विद्या को आदि ब्रह्मा भी जानते थे।  इस विद्या को उनके पुत्र अथर्वा भी जानते थे।  जब अथर्वा इस विद्या का गान गाते थे तो दीपमालिका प्रकाशित हो जाती थीं।  

दीपमालिका का प्रकाश क्या है? दीपमालिका है मानव की वाणी से दीपकों का प्रकाश हो जाना, उसको दीपमालिका कहते हैं।  देवगृह में याग होने को दीपमालिका कहते हैं।  उस अनुपम विद्या का पुनः से अध्ययन करना चाहिए।  उस विद्या के द्वारा मानव कृतार्थ होता है, मानव अपने में ये स्वीकार करता है कि वास्तव में यह विद्या मेरे द्वारा होनी चाहिए, इस विद्या से मेरा मानव जीवन ऊँचा बनेगा।  देखो ये विद्या बिना तप के नहीं आती।  हनुमान जी ने बारह वर्ष तक एकांत निर्जला उपवास करके अन्न को त्याग कर के उन्होंने इस विद्या का अध्ययन किया था।  वे सूर्य विद्या में नाना प्रकार के अणुओं और महा अणुओं को जानते रहते थे मुखारबिंद में इनको अर्पित करना, दीपमालिका का प्रकाश होना हनुमान जी के द्वारा एक अनुपम विद्या थी।  इस विद्या को जानने वाले ऋषिगण सूक्ष्म होते हैं, इस विद्या के लिए तप की आवश्यकता होती है।  अपने मानवीय जीवन को ऊँचा बनाने वाली ये विद्या है।  इस विद्या को धारण करने के पश्चात् ऐसे महापुरुषों का, ऐसे बुद्धिमानों का ऐसे ब्रह्मचारिओं का जन्म कहाँ होता है? कजली वनों में।  माता का कितना आपत्ति काल आ जाता है? परन्तु देखो ! वही माता सुखद को प्राप्त होती है जो निष्ठां को नहीं त्यागती।  मानव वहीँ ऊँचा होता है जो निष्ठा वान होता है, जिसके द्वारा निष्ठां होती है और निष्ठित बन कर के यह संसार ऊँचा बनता है। ऐसी निष्ठा में मानव रमण करता रहता है। 
विवाह
जब ब्रह्मचारी हनुमान ४८ वर्ष का हुआ तो महाराजा सुग्रीव की कन्या (रोहिणी) से उनका संस्कार हुआ । महाराजा सुग्रीव और बाली दोनों विधाता थे।  उस संस्कार के पश्चात् एक कन्या को जन्म देकर उसका निधन हो गया।  उसके निधन होने के पश्चात् उनकी अंतरात्मा ने कहा कि अब प्रकृतिवाद में नहीं जाना है , अब परमात्मा के विज्ञानं को जानना है। 
ब्रह्म फाँस 
जब महाराजा हनुमान लंका में पहुंचे और वह अशोक वाटिका को नष्ट कर रहे थे तो उस समय रावण के पुत्र मेघनाद का जब कुछ वश ना चला तो ब्रह्म फांस में उनको फाँस लिया।  उस समय हनुमान ने कहा था कि मैं  ब्रह्म फांस को नष्ट नहीं कर सकता क्योंकि मेरी मर्यादा नष्ट हो जायेगी।  भौतिक विज्ञान में ब्रह्म फांस रूपी यंत्र भी होता है परन्तु जिस ब्रह्म फांस में हनुमान को फांसा था वह यज्ञोपवीत ही  था। उन्होंने कहा के मैं  इसे नष्ट कर सकता हूँ परन्तु मुझे मर्यादा की आज्ञा नहीं है कि मैं  इसे शांत करूँ, ये मेरा आर्य चिन्ह है।  आर्य उसे कहते हैं जो शुद्ध और पवित्र होता है, जो अपनी मर्यादा की रक्षा करता है। 

आपका 
भवानंद आर्य 'अनुभव'

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