गुरुवार, 12 जनवरी 2017

संसार में चार धामों की प्राप्ति



ओ३म्
संसार में चार धामों की प्राप्ति




# जो मनुष्य विनाशशील स्त्री पुत्र धन मान कीर्ति अधिकार आदि इस लोक और परलोक की भोग सामग्रियों में आसक्त होकर उन्हीं को सुख का हेतु समझते हैं तथा उन्हीं के अर्जन सेवन में सदा संलग्न रहते हैं एवं इन भोग सामग्रियों की प्राप्ति संरक्षण तथा वृद्धि के लिए उन विभिन्न देवता पितर और मनुष्यादि की उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म मरण के चक्र में पड़े हुए होने के कारण अभाव ग्रस्त और शरीर की दृष्टि से विनय शील हैं, उनके उपासक वे भोगासक्त मनुष्य अपनी उपासना के फलस्वरूप विभिन्न देवताओं के लोकों को और विभिन्न भोग योनियों को प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञान रूप घोर अंधकार में प्रवेश करना है।

दूसरे जो मनुष्य शास्त्र के तात्पर्य को तथा भगवान के दिव्य गुण प्रभाव तत्व और रहस्य को न समझने के कारण न तो भगवान भजन ध्यान ही करते हैं और न श्रद्धा का अभाव तथा भोगों में आसक्ति होने के कारण लोकसेवा और शास्त्र विहित देवोपासना में ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषयासक्त मनुष्य झूठ मूठ ही अपने को ईश्वरोपासक बतलाकर सरल ह्रदय जनता से अपनी पूजा करवाने लगते हैं। ये लोग मिथ्याभिमान के कारण देवताओं को तुच्छ बतलाते हैं और शास्त्रानुसार अवश्य कर्तव्य देवपूजा तथा गुरु जनों का सेवा सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। तथा दूसरों को भी अपने वाग्जाल में फँसाकर उनके मनों में भी देवोपासना आदि के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। ये लोग अपने को ही ईश्वर के समकक्ष मानते मनवाते हुए मनमाने दुराचरण में प्रवृत्त हो जाते हैं। ऐसे दम्भी मनुष्यों को अपने दुष्कर्मों का कुफल भोगने के लिए बाध्य होकर कूकर शूकर आदि नीच योनियों में और अतल वितल रौरव व कुम्भी पाक आदि नरकों में जाकर भीषण यंत्रणाएं भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाश शील देवताओं की उपासना करने वालों की अपेक्षा भी अधिकतर घोर अन्धकार में प्रवेश करना है।

जो मनुष्य समस्त जड़ जगत के अनादि नित्य कारण का उपासना भाव से स्वीकार करते हैं वे अविद्या को प्राप्त होकर क्लेश को प्राप्त होते और जो उस कारण से उत्पन्न स्थूल सूक्ष्म कार्यकारणाख्य अनित्य संयोग जन्य कार्य जगत को इष्ट उपास्य मानते हैं वे गाढ़ अविद्या को पाकर अधिकतर क्लेश को प्राप्त होते हैं इसलिए सच्चिदानंद स्वरूप परमात्मा या विद्वान की ही सब सदा उपासना करें।

# हे मनुष्यों जैसे विद्वान लोग कार्य कारण वस्तु से भिन्न भिन्न वक्ष्यमाण उपकार लेते और लिवाते हैं तथा उन कार्य कारण के गुणों को जानकर जनाते हैं। ऐसे ही तुम लोग भी निश्चय करो।

# हे मनुष्यों! कार्य कारण वस्तु निरर्थक नहीं है किन्तु कार्य कारण के गुण कर्म और स्वभावों को जानकर धर्म आदि मोक्ष के साधनों में संयुक्त करके अपने शरीरादि कार्य कारण को नित्यत्व से जान के मरण का भय छोड़ कर मोक्ष की सिद्धि करो। इस प्रकार कार्य कारण से अन्य ही फल सिद्ध करना चाहिए। इन कार्य कारण का निषेध परमेश्वर के स्थान में जो उपासना उस प्रकरण में करना चाहिए।

# जो जो चेतन ज्ञानादि गुण युक्त वस्तु है वह जानने वाला, जो अविद्या रूप है वह जानने योग्य है और जो चेतन ब्रह्म तथा विद्वान का आत्मा है वह उपासना के योग्य है जो इससे भिन्न है वह उपास्य नहीं है किन्तु उपकार लेने योग्य है। जो मनुष्य अविद्या अस्मिता राग द्वेष और अभिनिवेश नामक क्लेशों से युक्त हैं वे परमेश्वर को छोड़ इससे भिन्न जड़ वस्तु की उपासना कर महान दुखसागर में डूबते हैं और जो शब्द अर्थ का अन्वय मात्र संस्कृत पढ़कर सत्यभाषण पक्षपात रहित न्याय का आचरण रूप धर्म नहीं करते अभिमान में आरुढ़ हुए विद्या का तिरस्कार कर अविद्या को ही मानते हैं वे अत्यंत तमोगुण रूप दु:खसागर में निरन्तर पीड़ित होते हैं।

# अनादि गुण युक्त चेतन से उपयोग होने योग्य है वह अज्ञान युक्त जड़ से कदापि नहीं और जो जड़ से प्रयोजन सिद्ध होता है वह चेतन से नहीं। सब मनुष्यों को विद्वानों के संग, योग, विज्ञान और धर्माचरण से इन दोनों का विवेक करके दोनों से उपयोग लेना चाहिए।


# जो मनुष्य विद्या और अविद्या को उनके स्वरूप से जानकर इन के जड़ चेतन साधक हैं ऐसा निश्चय कर सब शरीरादि जड़ पदार्थ और चेतन आत्मा को धर्म अर्थ काम और मोक्ष की सिद्धि के लिए साथ ही प्रयोग करते हैं वे लौकिक दुख को छोड़ परमार्थ के सुख को प्राप्त होते हैं। जो जड़ प्रकृति आदि कारण वा शरीरादि कार्य न हो तो परमेश्वर जगत की उत्पत्ति और जीव कर्म उपासना और ज्ञान के करने को कैसे समर्थ हो। इससे न केवल चेतन से अथवा न केवल कर्म से तथा न केवल ज्ञान से कोई धर्मादि (चार धाम- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) पदार्थों की सिद्धि करने में समर्थ होता है।


सन्दर्भ :
यजुर्वेद॥४०।९-१४॥
ईशावास्योपनिषद॥९-१४॥


आपका अपना
ब्रह्मचारी अनुभव शर्मा

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

free counters

फ़ॉलोअर